2.5 करोड़ सालाना सैलरी छोड़कर खेती अपनाने वाले व्यक्ति की प्रेरणादायक कहानी
आज के समय में जब हर कोई बड़ी सैलरी, मल्टीनेशनल कंपनी और लग्ज़री लाइफ के पीछे भाग रहा है, ऐसे में 2.5 करोड़ रुपये सालाना कमाने वाली नौकरी छोड़ना किसी के लिए भी पागलपन जैसा लग सकता है। लेकिन यह कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की, जिसने करोड़ों की सैलरी, विदेशी लाइफस्टाइल और कॉर्पोरेट दुनिया की चमक-दमक छोड़कर खेती को अपना जीवन बना लिया।
कॉर्पोरेट दुनिया में ऊँचाई तक पहुँचा सफर
इस व्यक्ति का नाम मान लेते हैं अमित वर्मा। अमित एक बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनी में सीनियर एग्जीक्यूटिव थे। आईआईटी और विदेश से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने इंटरनेशनल कंपनी जॉइन की। सालों की मेहनत के बाद उनकी सालाना सैलरी 2.5 करोड़ रुपये तक पहुँच चुकी थी। बंगला, लग्ज़री कार, विदेश यात्राएँ – सब कुछ था।
बाहर से देखने पर उनकी ज़िंदगी परफेक्ट लगती थी।
अंदर की खालीपन की भावना
लेकिन अमित अंदर से खुश नहीं थे। लगातार तनाव, 14–15 घंटे का वर्क प्रेशर, टारगेट्स और मीटिंग्स ने उन्हें मानसिक रूप से थका दिया था। उन्हें महसूस हुआ कि वह सिर्फ पैसा कमा रहे हैं, लेकिन जीवन नहीं जी रहे।
हर साल गाँव जाना उनके लिए सुकून का समय होता था। मिट्टी की खुशबू, खेतों की हरियाली और सादा जीवन उन्हें खींचता था। यहीं से उनके मन में एक सवाल उठने लगा –
“क्या ज़िंदगी सिर्फ सैलरी और प्रमोशन तक सीमित है?”
बड़ा फैसला: नौकरी छोड़ने का
काफी सोच-विचार और परिवार से चर्चा के बाद अमित ने 38 साल की उम्र में एक ऐसा फैसला लिया, जिस पर किसी को भरोसा नहीं हुआ। उन्होंने 2.5 करोड़ सालाना सैलरी वाली नौकरी से इस्तीफा दे दिया और खेती करने का निर्णय लिया।
शुरुआत में परिवार, दोस्त और सहकर्मी सबने विरोध किया। किसी ने कहा – “इतनी सैलरी छोड़कर पागल हो गए हो?”
किसी ने कहा – “खेती में क्या रखा है?”
लेकिन अमित का फैसला पक्का था।
खेती को भावनाओं से नहीं, प्लानिंग से अपनाया
अमित ने खेती को शौक नहीं, बल्कि एक प्रोफेशनल बिज़नेस की तरह अपनाया। उन्होंने बिना तैयारी के कोई कदम नहीं उठाया।
उन्होंने:
एग्रीकल्चर मैनेजमेंट कोर्स किए
सफल किसानों से सीधा मार्गदर्शन लिया
सरकारी योजनाओं और सब्सिडी को समझा
25 एकड़ ज़मीन लीज़ पर ली
उनका लक्ष्य था – कम ज़मीन में ज़्यादा मुनाफा।
आधुनिक और हाई-वैल्यू खेती की शुरुआत
अमित ने पारंपरिक फसलों की बजाय हाई-वैल्यू क्रॉप्स चुनीं। उन्होंने पॉलीहाउस और ओपन फार्मिंग दोनों को मिलाकर काम शुरू किया।
मुख्य फसलें थीं:
चेरी टमाटर
रंगीन शिमला मिर्च
विदेशी सब्ज़ियां
स्ट्रॉबेरी और ब्लूबेरी
ऑर्गेनिक पत्तेदार सब्ज़ियां
ड्रिप इरिगेशन, ऑटोमेटेड क्लाइमेट कंट्रोल और सॉइल टेस्टिंग जैसी तकनीकों ने उनकी लागत कम की और उत्पादन बढ़ाया।
शुरुआती मुश्किलें और सीख
शुरुआत के दो साल आसान नहीं थे। मौसम, बीमारी, मजदूरों की समस्या और मार्केट फ्लक्चुएशन ने कई बार नुकसान भी कराया। लेकिन अमित ने हार नहीं मानी। उन्होंने हर गलती को सीख में बदला।
उनका मानना था:
“खेती में नुकसान फेल्योर नहीं, ट्यूशन फीस है।”
आज की स्थिति
आज अमित लगभग 60 एकड़ में खेती कर रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने:
कोल्ड स्टोरेज
पैकेजिंग यूनिट
एग्री-टूरिज्म मॉडल
फार्म ट्रेनिंग प्रोग्राम
भी शुरू किए हैं।
पैसा नहीं, संतुष्टि सबसे बड़ी कमाई
अमित कहते हैं –
“कॉर्पोरेट जॉब में पैसा ज्यादा था, लेकिन ज़िंदगी दूसरों के नियमों पर चलती थी। आज खेती में मेहनत ज्यादा है, लेकिन आत्मसम्मान और आज़ादी भी है।”
इस कहानी से क्या सीख मिलती है?
पैसा सब कुछ नहीं होता
खेती घाटे का सौदा नहीं, अगर सही तरीके से की जाए
पढ़ा-लिखा युवा भी खेती को बदल सकता है
कॉर्पोरेट स्किल्स खेती में बहुत काम आती हैं
निष्कर्ष
2.5 करोड़ सालाना सैलरी छोड़कर खेती अपनाने वाले इस व्यक्ति की कहानी यह दिखाती है कि असली सफलता वही है, जिसमें संतोष और उद्देश्य हो। खेती आज सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि एक स्मार्ट करियर ऑप्शन भी बन सकती है — अगर सोच आधुनिक हो।

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